Friday, July 31, 2009

करियर - इंडस्ट्री में एक अलग मुकाम


वक्त के साथ इंडस्ट्री की डिमांड बदली है और स्टूडेंट्स की च्वाइस भी। स्टूडेंट अब कुछ ऐसा नया करना चाहते हैं, जिससे वे इंडस्ट्री में एक अलग मुकाम बना सकें। इस अंक में हम कुछ ऐसे ही नए कोर्सो के बारे में पडताल कर रहे हैं, जिनमें आने वाले दिनों में अच्छी संभावनाएं देखी जा रही हैं। जैव विविधता
ग्लोबल वार्मिग पूरे विश्व के लिए गंभीर समस्या बन गई है। इसकी वजह से जीव-जंतुओं की कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। इसीलिए अब कनजर्वेस्टनिस्ट की मांग जोर पकड रही है। गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी ने बायो डायवर्सिटी ऐंड कनजर्वेशन में मास्टर प्रोग्राम लॉन्च किया है। इसमें थ्योरी के साथ-साथ प्रैक्टिकल पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। इस फील्ड में आने के लिए जैव विविधता की अच्छी जानकारी जरूरी है, जैसे-बायो डायवर्सिटी यानी जैव विविधता के बारे में मूल्याकंन, साइट सर्वे, साइट मैनेजमेंट, जिओ इन्फॉर्मेंटिक सिस्टम आदि। प्रोग्राम खत्म करने के बाद रोजगार के लिए इंटरनेशनल एनजीओ, व‌र्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड और नेशनल वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन ग्रुप में कोशिश कर सकते हैं। इसके अलावा, मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरनमेंट ऐंड फॉरेस्ट ऐंड एडवाइजरी बोर्ड में भी नौकरी की अच्छी संभावनाएं हैं। आवेदन करने के लिए बीएससी में कम से कम 50 प्रतिशत अंक होने चाहिए। एंट्री प्रवेश परीक्षा के आधार पर होती है।
फैशन स्टाइलिंग
फैशन स्टाइलिंग से जुडे पेशवर एक असाइनमेंट के लिए करीब 15 से 20 हजार रुपये तक लेते हैं। भारत के लिए फैशन स्टाइलिंग का कॉन्सेप्ट नया है, लेकिन अब फैशन के प्रति लोगों के बढते क्रेज की वजह से इस फील्ड में काफी स्कोप हैं। यदि आप लोगों को स्टाइलिश बनाने का हुनर रखते हैं, तो फैशन स्टाइलिंग में काफी अच्छा करियर हो सकता है। इस फील्ड में सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप खुद की मार्केटिंग किस तरह से कर पाते हैं! साथ ही, फैशन व‌र्ल्ड के नए ट्रेंड की जानकारी भी जरूरी है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी या इससे संबद्ध प्राइवेट संस्थानों में संबंधित कोर्स उपलब्ध हैं। कोर्स में मेकअप नॉलेज, हेयर स्टाइल, फोटोग्राफी, कम्प्यूटर और आईटी ऐप्लिकेशन के बारे में जानकारी दी जाती है। एंट्री के लिए 12वीं पास होना जरूरी है। कोर्स पूरा करने के बाद फैशन हाउस, एड फिल्म, फिल्म इंडस्ट्री, इवेंट मैनेजमेंट कंपनी आदि में रोजगार की तलाश कर सकते हैं।
हेल्थ मैनेजमेंट
प्राइसवाटरहाउसकूपर्स के मुताबिक हेल्थकेयर सेक्टर का आकार वर्ष 2010 तक 40 बिलियन डॉलर यानी 40 अरब डॉलर के आंकडे को पार कर सकता है। वहीं मैकिंजे-सीआईआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, मेडिकल टूरिज्म का मार्केट भी वर्ष 2012 तक दो अरब डॉलर का हो जाएगा। जब हेल्थकेयर इंडस्ट्री इतनी तेजी से बढ रही है, तो ट्रेंड प्रोफेशनल्स की जरूरत पडेगी ही। यदि आप एमबीए इन हेल्थकेयर मैनेजमेंट करना चाहते हैं, तो इस कोर्स के अंतर्गत पहले साल में मैनेजमेंट स्किल, हेल्थकेयर लॉ और रेगुलेशन के बारे में पढाया जाता है, जबकि सेकेंड ईयर में हॉस्पिटल ऑपरेशन मैनेजमेंट या मेडिकल टूरिज्म आदि में स्पेशलाइजेशन कर सकते हैं। प्लेसमेंट की बात करें, तो कोर्स पूरा करने के बाद हेल्थकेयर एग्जीक्यूटिव के तौर पर हॉस्पिटल, हॉस्पिटल ऑर्किटेक्चर फर्म में एडवाइजर, मेडिकल सुपरिटेंडेंट, चीफ मेडिकल ऑफिसर, ट्रैवल इंडस्ट्री में कंसल्टेंट आदि के रूप में करियर की शुरुआत कर सकते हैं। मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से साइंस, फार्मेसी और मेडिसिन में स्नातक की डिग्री रखने वाले स्टूडेंट्स इस कोर्स में एंट्री ले सकते हैं। यहां सैलरी भी काफी अच्छी है। एंट्री लेवल सैलरी 15 से 20 हजार रुपये के करीब होती है।
इंडस्ट्रियल एरिया प्लानिंग
देश की इंडस्ट्रीज के विकास के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। इसमें स्पेशल इकोनॉमिक जोन, स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन और इंडस्ट्रियल टाउनशिप भी शामिल हैं। यही वजह है कि इंडस्ट्रियल एरिया मैनेजमेंट और प्लानिंग आज इंडस्ट्री की जरूरत बन गई है। पेशेवरों की बढती हुई डिमांड को देखते हुए इंडस्ट्रियल एरिया प्लानिंग ऐंड मैनेजमेंट में एमटेक कोर्स की शुरुआत की गई है। इससे जुडे स्टूडेंट्स इंडस्ट्रियल एरिया के प्लानिंग, डिजाइनिंग, डेवलपमेंट और मैनेजमेंट के क्षेत्र में काम करते हैं। जहां तक जॉब की बात है, तो गवर्नमेंट डिपार्टमेंट के साथ-साथ एनजीओ, रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन, कंसल्टेंसी ऑर्गनाइजेशन आदि में संभावनाएं हैं। इस कोर्स में प्रवेश के लिए ऑर्किटेक्चर/ सिविल इंजीनियरिंग/ प्लानिंग में बैचलर डिग्री या फिर जिओग्रफी /इकोनॉमिक्स/सोशयोलॉजी में मास्टर डिग्री रखने वाले स्टूडेंट्स आवेदन कर सकते हैं।
डाटा स्टोरेज
इंडस्ट्री में आज ऐसे लोगों की कमी महसूस की जा रही हैं, जो डेटाज को सही तरीके से मैनेज कर सकें। इसी बात को ध्यान में रखते हुए स्टोरेज नेटवर्किंग इंडस्ट्री एसोसिएशन ने ट्रेनिंग प्रोग्राम ऑफर किया है। इस कोर्स में एंट्री के लिए आईटी की बेसिक जानकारी के साथ-साथ आईटी कंपनी में कम से कम छह महीने तक काम करने का एक्सपीरियंस जरूरी है। डाटा स्टोरेज पेशेवर की शुरुआती सैलरी 10 से 12 हजार रुपये तक होती है।
क्लीनिकल रिसर्च
मैकिंजे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2013 तक क्लीनिकल रिसर्च के क्षेत्र में 50 हजार पेशेवर लोगों की जरूरत होगी। इतना ही नहीं, ग्लोबल फार्मा कंपनियों का रुख भारत की तरफ होने से इस क्षेत्र में स्कोप काफी बढ गया है। कुछ इंस्टीट्यूट्स ने क्लीनिकल रिसर्च से जुडे कोर्स की शुरुआत की है। एमबीबीएस, बीडीएस, बीएएमएस, बीएचएम, बीई, बी टेक, बीफार्मा, बीएससी नर्सिग आदि की डिग्री रखने वाले स्टूडेंट्स क्लीनिकल रिसर्च से जुडे कोर्स में एडमिशन ले सकते हैं।
पब्लिक मैनेजमेंट
यदि आप चाहें, तो पब्लिक मैनेजमेंट ऐंड पॉलिसी में पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स कर सकते हैं। इसमें गवर्नेंस, पॉलिसी, क्रियान्वयन, इन्फ्रॉस्ट्रक्चर डेवलपमेंट और पब्लिक एंटरप्राइज मैनेजमेंट पर फोकस किया गया है। किसी भी विषय से स्नातक करने वाले छात्र इस कोर्स के लिए आवेदन कर सकते हैं। आवेदन करने वाले स्टूडेंट्स की उम्र 27 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए। कोर्स पूरा करने के बाद पब्लिक सेक्टर के साथ-साथ प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों में जॉब की तलाश कर सकते हैं। प्राइवेट कंपनियों की बात करें, तो अर्नेस्ट यंग, मैकिंजे, जीएमआर और रिलायंस जैसी कंपनियों में भी अच्छा मौका है।
डेवलपमेंट फाइनेंस अगर आप इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, तो पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा इन मैनेजमेंट डेवलपमेंट ऐंड सस्टेनबल फाइनेंस कोर्स कर सकते हैं। कोर्स में एडमिशन लेने के लिए 10वीं, 12वीं और ग्रेजुएशन में फ‌र्स्ट डिवीजन होना जरूरी है। इसके अलावा, कैट स्कोर में कम से कम 85 प्रतिशत अंक होने पर ही एडमिशन के लिए विचार किया जा सकता है। जहां तक प्लेसमेंट की बात है, तो एनजीओ, डेवलपमेंट कंपनी, बैंक आदि में नौकरियां मिल सकती हैं।
मेट्रो टेक्नोलॉजी
इस समय मेट्रो का विस्तार देश के कई प्रमुख शहरों में हो रहा है। यही वजह है कि मेट्रो टेक्नोलॉजी में पेशेवर लोगों की मांग बढ गई है। इसी को ध्यान में रखते हुए आईआईटी, दिल्ली और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने एक समझौता किया है। जिसके तहत पेशेवर लोगों को मेट्रो टेक्नोलॉजी में ट्रेंड किया जाएगा। यह एक साल का प्रोग्राम है। इसमें 12 कोर्स हैं। एक्सपर्ट के मुताबिक इस समय देश में कंस्ट्रक्शन और मेट्रो रेल सिस्टम के ऑपरेशन से जुडे ट्रेंड लोगों की काफी कमी है। बीटेक या फिर बीआर्क की डिग्री रखने वाले स्टूडेंट्स इस कोर्स में एडमिशन ले सकते हैं।
पैकेजिंग और प्रिंटिंग
जो दिखता है, वही बिकता है। यह बात पैकेजिंग और प्रिंटिंग इंडस्ट्री पर भी लागू है। जिस प्रोडक्ट की पैकेजिंग जितनी अच्छी होती है, ग्राहक की नजर में वह उतनी ही जल्द चढ जाता है। इन दिनों भारत में पैकेजिंग इंडस्ट्री रफ्तार पकड रही है। इसीलिए पैकेजिंग से जुडे लोगों की मांग भी बढ रही है। यदि आप इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, तो आपके लिए सर्टिफिकेट प्रोग्राम इन पैकेजिंग, पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा, एग्जीक्यूटिव डेवलपमेंट प्रोग्राम आदि कोर्स उपलब्ध हैं। इसमें पैकेजिंग डिजाइन ऐंड डेवलपमेंट, प्रिंटिंग और पैकेजिंग मशीन, क्वालिटी कंट्रोल पर अधिक जोर दिया जाता है। कोर्स खत्म करने के बाद एफएमसीजी कंपनी, एक्सपोर्ट हाउस और पि्रंटिंग कंपनी में काम कर सकते हैं। 12वीं और ग्रेजुएशन के बाद इस कोर्स में एडमिशन ले सकते हैं।
(परवीन मल्होत्रा, अनिल सेठी से बातचीत पर आधारित)
.imr007@gmail.com

पर्दे पर चित्रित प्यार के बदलते अंदाज



प्यार अब अमू‌र्त्त एहसास नहीं रह गया है। खासकर हिंदी फिल्मों को देखते हुए पर्दे पर चित्रित प्यार के बदलते अंदाज के मद्देनजर इसे रेखांकित किया जा सकता है। इश्क के कमीना और कमबख्त होने जैसे जुमलों से परहेज करने पर भी मानना होगा कि इन दिनों पर्दे पर चल रहा रोमांस और प्यार पहले की अपेक्षा शारीरिक और दिखावटी हो गया है। फिल्म की तस्वीरें देख लें, हीरो-हीरोइन प्रेम और आलिंगन की सुविधाजनक मुद्राओं में नजर आते हैं। दर्शक को आकर्षित करने के लिए बनाए गए पोस्टर और प्रोमो पहले मर्यादित होते थे। पर्दे पर चित्रित रोमांस अब आक्रामक और चिपकाऊ हो चुका है। उसके एहसास को अब रूह से महसूस करने की जरूरत नहीं है। पिछले दिनों आई कमबख्त इश्क के संवाद की तीखी आलोचना हुई। यहां तक कि मुख्य भूमिका निभा रहे करीना कपूर और अक्षय कुमार को भी लोगों ने नहीं बख्शा, लेकिन सच यही है कि कमबख्त इश्क की जमीन पिछले दस साल में तैयार हुई है। दर्शक का एक समूह प्यार के इस प्रदर्शन पर वाह-वाह करता है। वह हीरो-हीरोइन के बोले संवाद को अपने रिंगटोन के रूप में इस्तेमाल करता है। वही ऐसी फिल्मों को हिट कराता है।
हिंदी फिल्मों की यह शैलीगत विशेषता है कि हर फिल्म में एक प्रेम कहानी चलती है। फिल्म का विषय कुछ भी हो। उसमें हीरो-हीरोइन का रोमांस होता ही है। हां, फिल्म के थीम के अनुसार कभी रोमांस पृष्ठभूमि या हाशिए पर हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि रोमांस के दृश्य बिल्कुल न हों। युवा निर्देशक प्रेम कहानी की इस अनिवार्यता की मुश्किलों की बातें करने लगे हैं। संभव है अगले कुछ वर्षो में रोमांस दरकिनार हो जाए, लेकिन अभी रोमांस हिंदी फिल्मों का प्रमुख मसाला है और रहेगा। ऐक्शन, थ्रिलर, कॉमेडी जैसी विधाओं की फिल्मों में भी हीरो-हीरोइन रोमांस के क्षण निकाल ही लेते हैं। दर्शकों की रुचि का खयाल रखते हुए उन्हें यह मौका फिल्म के लेखक और निर्देशक देते हैं।
याद करें, तो पहले की फिल्मों में हीरो-हीरोइन की पहली मुलाकात और प्यार के एहसास में वक्त लगता था। उस प्यार को कुबूल करने या इजहार करने में और भी ज्यादा वक्त लगता था। आजादी के आसपास ऐसी फिल्में बनीं, जिनमें प्यार का इजहार नहीं दिखा। तब अधूरे प्यार की दास्तान दर्शकों को अधिक प्रभावित करती थी। इंतजार और चाहत का सुरूर दर्शकों को नशा देता था। ज्यादातर क्लासिक प्रेम-कहानियों में हीरो-हीरोइन मिल ही नहीं पाते थे। फिर ऐसा दौर आया, जब माता-पिता और समाज प्यार के दुश्मन बन गए। प्यार जैसे स्वाभाविक और मानवीय भाव की अभिव्यक्ति और स्वीकृति में कई अड़चनें आई। आंखों ही आंखों में हुए इशारे से लेकर शादी के मंडप के सात फेरों के बीच ही कहानी चलती रही। अंत में हीरो-हीरोइन के मिलने के बाद ही पर्दे पर द एंड शब्द आ जाते थे, जो आज की फिल्मों में नहीं दिखता।
उसकी एक वजह हो सकती है कि अब प्रेम कहानी से ज्यादा जोर प्रेम-प्रसंग पर रहता है। हीरो-हीरोइन के बीच मुलाकात, भिड़ंत, मोहब्बत और नफरत के सीन होते हैं। पहले की फिल्मों की तरह हीरो-हीरोइन महज आशिक नहीं होते। जिंदगी के रोजगार में परेशान आज के प्रेमी रोमांस के हसीन पल की चाहत में इतने उतावले होते हैं कि मिलते ही आलिंगन और चुंबनों की बौछार कर देते हैं। पिछले दस वर्षो में आई फिल्मों पर गौर करें, तो पाएंगे कि कुछ ही फिल्मों की हीरोइन या हीरो के चेहरे याद हैं। प्यार के चित्रण में गहराई नहीं होने के कारण हमें आज के स्टार प्रेमी या प्रेमिका के रूप में याद नहीं रहते। उनकी कोई छवि दर्शकों के दिमाग में नहीं बैठती। प्रेम कहानियों के इस देश में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के बाद जब वी मेट ही पॉपुलर लव स्टोरी के रूप में याद आती है। कहते हैं आधुनिक जिंदगी की आपाधापी में हमारे पास रोमांस के लिए वक्त नहीं है। हमारा रोमांस संबंधों को निभाने तक ही सीमित रह गया है। वास्तविक जिंदगी में रोमांटिक व्यक्तियों को अनरिअल माना जाता है। इसके साथ ही प्यार की अभिव्यक्ति और प्रदर्शन के तरीके बदल गए हैं। हमारे पास सब कुछ तेजी से घट रहा है। संवाद और संप्रेषण के नए माध्यम हमारी जिंदगी के हिस्से बन गए हैं। हम एमएमएस और चैट में अपने भाव और एक्सप्रेशन के लिए स्माइली इस्तेमाल करने लगे हैं। सिर्फ आई लव यू या एलओएल (लॉट्स ऑफ लव) लिखने से भाव व्यक्त नहीं हो पाते। इस बारे में बात होती है सैफ अली खान से। वे कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि पर्दे पर प्यार का एहसास बदला है। समाज में जितनी तेजी से परिव‌र्त्तन आया है, पर्दे पर वह तेजी नहीं दिखाई पड़ती। पहले वक्त ज्यादा था और प्यार के बीच मुश्किलें भी थीं, इसलिए उसकी कामयाबी में रोमांच और रोमानी एहसास रहता था। आज भी उस रोमांस को हम महसूस करते हैं, लेकिन शायद उसे जाहिर करने में हम ज्यादा फिजिकल हो गए हैं। हम अपनी भावनाओं को पहले की तरह दबाकर या दुनिया से छिपाकर नहीं रख पाते।
इसी बारे में प्रियंका चोपड़ा कहती हैं कि हिंदी फिल्मों में प्यार का चित्रण बदला है। अब यह पहले की तरह नहीं रहा। लोग मानते हैं कि पर्दे पर दिखने वाला प्यार वास्तविक नहीं होता, लेकिन हमारे लेखक जिंदगी और समाज से ही कहानियां लेते हैं। देखें तो हमारा समाज बदल गया है। मैं अभी प्यार इंपॉसिबल कर रही हूं। उसमें एक निहायत सुंदर लड़की से सामान्य लड़का प्रेम करता है। हो सकता है, यह वैसे संभव न लगे, लेकिन ऐसी जोडि़यां हम अपने आसपास देखते हैं। दीपिका पादुकोण भी कहती हैं कि हर नई पीढ़ी के साथ रोमांस बदल जाता है। वह समय की जरूरत और मांग से प्रभावित होता है। मेरी उम्र में उस अंदाज का रोमांस नहीं हो सकता, जो मेरे माता-पिता के समय होता था। फर्क पर्दे पर भी दिखता है।
राज कपूर और रणबीर कपूर के प्यार करने के अंदाज में फर्क तो होगा ही। मुझे लगता है कि प्यार के साथ जो जुड़े होने का भाव है, वह नहीं बदला है। अपने देश में वह बदल भी नहीं सकता!
शाहिद कपूर के बाद सैफ अली खान की प्रेमिका के रूप में चर्चा पाने वाली करीना कपूर कहती हैं कि पहले गुपचुप प्यार होता था। अब समाज में खुलापन आया है, तो वह खुलापन पर्दे पर भी दिख रहा है। मैं तो कहूंगी कि रिअल जिंदगी में रोमांस और प्यार जितना बोल्ड हुआ है, वह पर्दे पर नहीं आया है। जिस प्रकार पर्दे पर हीरोइनों के सुंदर दिखने का नजरिया बदल गया है, उसी प्रकार उनके प्रेम का एक्सप्रेशन भी बदला है। आजकल के युवक थोड़े अग्रेसिव और बोल्ड हो गए हैं। हम पर्दे पर वही बोल्डनेस लाने की कोशिश करते हैं।

Sunday, July 12, 2009

सम्लेंगिकता -- एक घोर अपराध !!!!!

सम्लेंगिकता नयी चीज नहीं है . सदियों से इसका चलन चलता आ रहा है. पर इसे कभी सामाजिक मान्यता नहीं दी गई. यह एक घोर अपराध है. कोई चीज पुराणी होने से स्विकरिया नहीं होती है.मर्डर, रैप, चोरी ये सभी सदियों से चले आ रहे है इसलिए इन्हे मान्यता तो नहीं दी जा सकती . तर्क यह भी दिया जा रहा है ज्यादातर कामयाब लोग सम्लेंगिक है.लेकिन यह एक बेकार सोच है.
भारत में परिवार सबसे बड़ी ओर सफल संस्था है. यह भारतीय परम पारा ,सभ्यता , ओर संकृति का परिचालक है. इसमे सम्लेंगिकता का वायरस घुसना एक षडयंत्र है.
संविधान में नागरिक स्वतंत्रता की बात की गई है.
लेकिन संविधान में साथ ही यह भी कहाँ गया है की मर्यादा ओर लोक परम्परा के विरूद्व कोई भी स्वतंत्रता मान्य नहीं होगी.
संविधान में तो अधिकारों के साथ दयित्यावो का जिक्र बगही किया गया है. सिर्फ़ अधिकारों की बात करे ओर दायित्वों का निर्व्हारण करे, तो यह अपराध होगा !!
सस्त्रो में सम्लेंगिकता का कहीं कोई जीकर नही है. भितिचित्रो के मध्यम से ही इसे कहीं कहीं दिखाया गया है. विवाह से पहले जो भी सम्बन्ध होते है वो सभी अपराध है. यदि इसे बढ़ावा मिलता है तो आगे चलकर बचो का बंटवारा, सम्पति विवाद सहित ऐसे अनेक असाध्य रोग फेलेंगे.
जिसका parinam भयंकर होगा.......
सम्लेगिकता एक संगठित सेक्स अपराध है..सरकार यदि इसे कानून के दायरे में लती है तो इसका रास्ट्रीय इस्टर पर विरोध किया जाएगा.....इस बीमारी से देश के युवाओ को बचने के लिए हम सबको कुछ कुछ करना पड़ेगा,,,,,,,,,,,,,,
shyam tyagi