
प्यार अब अमूर्त्त एहसास नहीं रह गया है। खासकर हिंदी फिल्मों को देखते हुए पर्दे पर चित्रित प्यार के बदलते अंदाज के मद्देनजर इसे रेखांकित किया जा सकता है। इश्क के कमीना और कमबख्त होने जैसे जुमलों से परहेज करने पर भी मानना होगा कि इन दिनों पर्दे पर चल रहा रोमांस और प्यार पहले की अपेक्षा शारीरिक और दिखावटी हो गया है। फिल्म की तस्वीरें देख लें, हीरो-हीरोइन प्रेम और आलिंगन की सुविधाजनक मुद्राओं में नजर आते हैं। दर्शक को आकर्षित करने के लिए बनाए गए पोस्टर और प्रोमो पहले मर्यादित होते थे। पर्दे पर चित्रित रोमांस अब आक्रामक और चिपकाऊ हो चुका है। उसके एहसास को अब रूह से महसूस करने की जरूरत नहीं है। पिछले दिनों आई कमबख्त इश्क के संवाद की तीखी आलोचना हुई। यहां तक कि मुख्य भूमिका निभा रहे करीना कपूर और अक्षय कुमार को भी लोगों ने नहीं बख्शा, लेकिन सच यही है कि कमबख्त इश्क की जमीन पिछले दस साल में तैयार हुई है। दर्शक का एक समूह प्यार के इस प्रदर्शन पर वाह-वाह करता है। वह हीरो-हीरोइन के बोले संवाद को अपने रिंगटोन के रूप में इस्तेमाल करता है। वही ऐसी फिल्मों को हिट कराता है।
हिंदी फिल्मों की यह शैलीगत विशेषता है कि हर फिल्म में एक प्रेम कहानी चलती है। फिल्म का विषय कुछ भी हो। उसमें हीरो-हीरोइन का रोमांस होता ही है। हां, फिल्म के थीम के अनुसार कभी रोमांस पृष्ठभूमि या हाशिए पर हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि रोमांस के दृश्य बिल्कुल न हों। युवा निर्देशक प्रेम कहानी की इस अनिवार्यता की मुश्किलों की बातें करने लगे हैं। संभव है अगले कुछ वर्षो में रोमांस दरकिनार हो जाए, लेकिन अभी रोमांस हिंदी फिल्मों का प्रमुख मसाला है और रहेगा। ऐक्शन, थ्रिलर, कॉमेडी जैसी विधाओं की फिल्मों में भी हीरो-हीरोइन रोमांस के क्षण निकाल ही लेते हैं। दर्शकों की रुचि का खयाल रखते हुए उन्हें यह मौका फिल्म के लेखक और निर्देशक देते हैं।
याद करें, तो पहले की फिल्मों में हीरो-हीरोइन की पहली मुलाकात और प्यार के एहसास में वक्त लगता था। उस प्यार को कुबूल करने या इजहार करने में और भी ज्यादा वक्त लगता था। आजादी के आसपास ऐसी फिल्में बनीं, जिनमें प्यार का इजहार नहीं दिखा। तब अधूरे प्यार की दास्तान दर्शकों को अधिक प्रभावित करती थी। इंतजार और चाहत का सुरूर दर्शकों को नशा देता था। ज्यादातर क्लासिक प्रेम-कहानियों में हीरो-हीरोइन मिल ही नहीं पाते थे। फिर ऐसा दौर आया, जब माता-पिता और समाज प्यार के दुश्मन बन गए। प्यार जैसे स्वाभाविक और मानवीय भाव की अभिव्यक्ति और स्वीकृति में कई अड़चनें आई। आंखों ही आंखों में हुए इशारे से लेकर शादी के मंडप के सात फेरों के बीच ही कहानी चलती रही। अंत में हीरो-हीरोइन के मिलने के बाद ही पर्दे पर द एंड शब्द आ जाते थे, जो आज की फिल्मों में नहीं दिखता।
उसकी एक वजह हो सकती है कि अब प्रेम कहानी से ज्यादा जोर प्रेम-प्रसंग पर रहता है। हीरो-हीरोइन के बीच मुलाकात, भिड़ंत, मोहब्बत और नफरत के सीन होते हैं। पहले की फिल्मों की तरह हीरो-हीरोइन महज आशिक नहीं होते। जिंदगी के रोजगार में परेशान आज के प्रेमी रोमांस के हसीन पल की चाहत में इतने उतावले होते हैं कि मिलते ही आलिंगन और चुंबनों की बौछार कर देते हैं। पिछले दस वर्षो में आई फिल्मों पर गौर करें, तो पाएंगे कि कुछ ही फिल्मों की हीरोइन या हीरो के चेहरे याद हैं। प्यार के चित्रण में गहराई नहीं होने के कारण हमें आज के स्टार प्रेमी या प्रेमिका के रूप में याद नहीं रहते। उनकी कोई छवि दर्शकों के दिमाग में नहीं बैठती। प्रेम कहानियों के इस देश में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के बाद जब वी मेट ही पॉपुलर लव स्टोरी के रूप में याद आती है। कहते हैं आधुनिक जिंदगी की आपाधापी में हमारे पास रोमांस के लिए वक्त नहीं है। हमारा रोमांस संबंधों को निभाने तक ही सीमित रह गया है। वास्तविक जिंदगी में रोमांटिक व्यक्तियों को अनरिअल माना जाता है। इसके साथ ही प्यार की अभिव्यक्ति और प्रदर्शन के तरीके बदल गए हैं। हमारे पास सब कुछ तेजी से घट रहा है। संवाद और संप्रेषण के नए माध्यम हमारी जिंदगी के हिस्से बन गए हैं। हम एमएमएस और चैट में अपने भाव और एक्सप्रेशन के लिए स्माइली इस्तेमाल करने लगे हैं। सिर्फ आई लव यू या एलओएल (लॉट्स ऑफ लव) लिखने से भाव व्यक्त नहीं हो पाते। इस बारे में बात होती है सैफ अली खान से। वे कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि पर्दे पर प्यार का एहसास बदला है। समाज में जितनी तेजी से परिवर्त्तन आया है, पर्दे पर वह तेजी नहीं दिखाई पड़ती। पहले वक्त ज्यादा था और प्यार के बीच मुश्किलें भी थीं, इसलिए उसकी कामयाबी में रोमांच और रोमानी एहसास रहता था। आज भी उस रोमांस को हम महसूस करते हैं, लेकिन शायद उसे जाहिर करने में हम ज्यादा फिजिकल हो गए हैं। हम अपनी भावनाओं को पहले की तरह दबाकर या दुनिया से छिपाकर नहीं रख पाते।
इसी बारे में प्रियंका चोपड़ा कहती हैं कि हिंदी फिल्मों में प्यार का चित्रण बदला है। अब यह पहले की तरह नहीं रहा। लोग मानते हैं कि पर्दे पर दिखने वाला प्यार वास्तविक नहीं होता, लेकिन हमारे लेखक जिंदगी और समाज से ही कहानियां लेते हैं। देखें तो हमारा समाज बदल गया है। मैं अभी प्यार इंपॉसिबल कर रही हूं। उसमें एक निहायत सुंदर लड़की से सामान्य लड़का प्रेम करता है। हो सकता है, यह वैसे संभव न लगे, लेकिन ऐसी जोडि़यां हम अपने आसपास देखते हैं। दीपिका पादुकोण भी कहती हैं कि हर नई पीढ़ी के साथ रोमांस बदल जाता है। वह समय की जरूरत और मांग से प्रभावित होता है। मेरी उम्र में उस अंदाज का रोमांस नहीं हो सकता, जो मेरे माता-पिता के समय होता था। फर्क पर्दे पर भी दिखता है।
राज कपूर और रणबीर कपूर के प्यार करने के अंदाज में फर्क तो होगा ही। मुझे लगता है कि प्यार के साथ जो जुड़े होने का भाव है, वह नहीं बदला है। अपने देश में वह बदल भी नहीं सकता!
शाहिद कपूर के बाद सैफ अली खान की प्रेमिका के रूप में चर्चा पाने वाली करीना कपूर कहती हैं कि पहले गुपचुप प्यार होता था। अब समाज में खुलापन आया है, तो वह खुलापन पर्दे पर भी दिख रहा है। मैं तो कहूंगी कि रिअल जिंदगी में रोमांस और प्यार जितना बोल्ड हुआ है, वह पर्दे पर नहीं आया है। जिस प्रकार पर्दे पर हीरोइनों के सुंदर दिखने का नजरिया बदल गया है, उसी प्रकार उनके प्रेम का एक्सप्रेशन भी बदला है। आजकल के युवक थोड़े अग्रेसिव और बोल्ड हो गए हैं। हम पर्दे पर वही बोल्डनेस लाने की कोशिश करते हैं।
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